मुद्राओ के बारे सुना होगा आपने बहुत बार ! एक विशेष मुद्रा से अपने इष्ट को सिद्ध किया जाता है 🧵 आपके इष्ट की कौनसी मुद्रा आपको दे सकती फलित सिद्धि ! मुद्रा के बारे तंत्र क्या कहता है ?
मुद्रा शब्द का अर्थ है- मु- समस्त देवों को मोद (आनन्द) देने वाला और दा=पाप सन्ततियो का द्रावण अर्थात क्षय। जैसा कि कहा गया है- गोदनात् सर्व देवानां द्रावणात् पाप सन्ततेः। तस्मान्मुद्रति विख्याता मुनिभिस्त्रन्त्रवेदिभिः ।। पूजन, जप, काम्य प्रयोग, स्नान, हवन विशेषार्ध्य स्थापन एवं नैवेद्य निवेदन के समय कल्प ग्रन्थों में बताये गये लक्षणों के अनुसार मुद्राएं बनाकर दिखानी चाहिए। "मुद्रा : प्रवक्षयामि यामि मादन्ते सर्व-देवता" शारदा तिलक तंत्र (23/106) की इस युक्त्ति के अनुसार साधना जगत् में मुद्राओं का महात्म्य सर्वविदित है। विश्व में प्रचलित प्रायः सभी धर्मो में मुद्रा का अपना विशेष स्थान रहा है, किंतु भारतीय सनातन धर्म के अंतर्गत आगम शास्त्र अर्थात् तंत्रों में मुद्राओं का जितना वर्णन मिलता है, उतना अन्यत्र नहीं। पूजा एवं साधना में मुद्रा प्रदर्शित करने से सभी देवता आनंदित होते हैं, पापों का क्षय हो जाता है, और देवताओं का सानिध्य आरम्भ हो जाता है। आवाहनादि की 9 मुद्राएँ, पूजन की गन्ध आदि मुद्राएँ तथा षडंगन्यास की मुद्राओं का सभी मन्त्रों के जप व पूजनादि में प्रयोग आवश्यक होता है। स्नान के समय अंकुश आदि मुद्राओं से तीर्थावाहन किया जाता है। शान्ति कर्म में पद्म मुद्रा, वशीकरण में पाश मुद्रा, स्तम्भन में गदा मुद्रा, विद्वेषण में मुसल मुद्रा, उच्चाटन में वज्ज मुद्रा एवं मारण में खड़ग मुद्रा का प्रयोग करना चाहिए। हवन में मृगी, हंसी व सूकरी मुद्रा का प्रयोग किया जाता है। शान्तिक व पौष्टिक कर्मों के हवन में मृगी मुद्रा से, वशीकरण के हवन में हँसी मुद्रा से तथा स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन एवं मारण कर्मो के हवन में सूकरी मुद्रा से आहुतियाँ डालने का विधान आचार्यों ने बताया है।
🌑 विष्णु की प्रिय मुद्राएँ- शंख, चक्र, गदा, पद्म, वेणु, भ्री वत्स, कौस्तुभ, वनमाला, ज्ञान, बिल्व, गरुड़, नारसिंही वाराही, हयग्रीवी, धनु-बाण, परशु, जगन्मोहनिका एवं काम ये 19 मुद्राएँ विष्णु भगवान की प्रिय मुद्राएँ हैं।
🌑 दुर्गा की प्रिय मुद्राएँ- पाश, अंकुश, वर, अभय, खडंग, चर्म, धनुष-बाण तथा मुसल ये 9 मुद्राएँ श्री दुर्गा जी को प्रिय है।
🌑 शिव की प्रिय मुद्राएँ- लिंग, योनि, त्रिशुल, माला, वर मृग, अभय, खट्वांग, कपाल एवं डमरू ये 10 मुद्राएँ शिव की प्रिय मुद्राएँ है
🌑 शयामा एवं शक्ति को प्रिय मुद्राएँ- मत्स्य, मूर्म एवं लेलिहाना ये 3 मुद्राएं श्यामा एवं शक्ति को प्रिय मुद्राएँ है। इनके अतिरिक्त श्यामा को मुण्ड मुद्रा तथा शक्ति को महायोनि मुद्रा प्रिय है। तारा को प्रिय मुद्राएँ - योनि, भूतिनी, बीज दैत्य, धूमिनी तथा लेलिहाना ये 5 मुद्राएँ तारा को प्रिय हैं।
त्रिपुरसुन्दरी को प्रिय मुद्राएँ- संक्षोभिणी, द्रावणी, आकर्षिणी, वश्य, उन्माद, महाकुंशा, खेचरी, बीज, योनि एवं त्रिखण्डा ये 10 मुद्राएँ श्री त्रिपुरसुन्दरी की प्रिय मुद्राएँ है।
🌑 पंचदेवों की मुद्राएँ- 1. शंख-बाएं हाथ के अंगूठे को दाहिने हाथ की मुट्ठी में लेकर बाएं हाथ की चारों उंगलियां सीधी करके दाहिने हाथ को मुट्ठी में दबायें और दाहिने हाथ के अंगूठें का अग्रभाग बाएं हाथ की तर्जनी के अग्रभाग में लगाएं तो शंख मुद्रा सम्पन्न होती है। 2. चक्र-दोनों हाथों को परस्पर देखते हुए भली भांति फैला दें, और कनिष्ठिकाओं को अंगूठों से लगा दें तो चक्र मुद्रा बनती है। 3. गदा- दोनों हाथ आपस में सम्मुख करके उंगलियां गूंथ दें, और बीच में फैले हुए अंगूठे उनमें लगा दें तो गदा मुद्रा होती है। 4. पद्म- दोनों हाथों को परस्पर मिलाकर फूल की डोडी या कली के समान खड़ी कर दें, और दोनों अंगूठे उनके भीतर तल भाग में लगा दें तो पद्म मुद्रा होती है। 5. तत्व- दाहिनें हाथ की अनामिका एवं अंगूठे के अग्रभाग को परस्पर जोड़ने पर तत्व मुद्रा होती है। 6. ज्ञान- तर्जनी और अंगूठे के अग्रभाग को हृदय पर लगाकर बाएं हस्त को दाएं मोड़ कर रखें तो इष्ट को प्रसन्न करने वाली ज्ञान मुद्रा होती है। 7. गरुड़-दोनों हाथों को विमुख करके अर्थात् दोनों की पीठ परस्पर मिला दें, कनिष्ठिकाओं को गूंथ दें, दोनों तर्जनियों को इसी प्रकार आपस में मिला दें, दोनों अंगूठों को भी मिला दें, मध्यमा, अनामिका को पंखों की भांति हिलाएं तो विष्णु प्रिय गरुड़ मुद्रा होती है। 8. नृसिंह- दोनों हाथों को पैरों के बीच में देकर उकडू बैठें ठोड़ी और ओष्ठ समान बना लें, दोनों हथेलियाँ जमीन में लगाएँ, मुख की आकृक्ति डरावनी बना लें. और जीभ को बाहर निकाल कर हिलाएं तो नृसिंह की प्रिय नारसिंही मुद्रा होती है। 9. धनुष- बाएं हाथ की मध्यमा के अग्रभाग को तर्जनी के अग्रभाग में जोड़े और अनामिका तथा कनिष्ठिका को अंगूठे से दबाकर बाएं हाथ के कंधे के समीप ले जाएं तो धनुष मुद्रा होती है। 10. बाण- दाहिने हाथ को सीधा करके मुट्ठी बांध लें और उसकी तर्जनी हो लंबी करें। 11. परशु - दोनों हाथों के करतल मिलाकर उंगलियों को फैलाने से फ़रसे के आकार की परशु मुद्रा होती है।
12. जगमोहन - दोनों हाथ की मुट्ठियों पर अंगूठा रखने से यह मुद्रा होती है। 13. काम- हाथों को सम्पुटित करके उंगलियों को फैला दें, दोनों तर्जनियों और मध्यमाओं को पीठ पर लगा दें और अंगूठे को मध्यमाओं से जोड़ दे तो काम मुद्रा होती है। 14. मत्स्य - दाहिने हाथ की पीठ पर बाएं हाथ की हथेली रखकर अंगूठों को हिलाते रहें, तो मत्स्य मुद्रा होती है। 15. लिंग- दाहिने हाथ के अंगूठे को उठाकर, दाएं हाथ की उंगलियों पर बाएं हाथ की उंगलियों से चिपका हो तो लिंग मुद्रा होती है। 16. योनि- कनिष्ठिकाओं को आपस में बांधे, ऊंची की हुई अनामिकाओं से तर्जनी को लगाएं. दोनों मध्यमा फैला दें और अंगूठे को उनके समीप से कनिष्ठिकाओं के समीय कर दें तो योनि मुद्रा होती है। 17. त्रिशूल - अंगूठे से कनिष्ठिका को दबाकर शेष तीनों उंगुलियों तर्जनी, नः यमा और अनामिका को सीधी करने से त्रिशूल मुद्रा होती है। 18. अमय - बाएं हाथ को ऊर्ध्वमुख फैला देने से अभय मुद्रा होती है। 19. वर- अधः स्थित दाहिने हाथ को आगे पसारने से वर मुद्रा होती है। 20. अंकुश- दाहिने हाथ के अंगूठे को बांध कर मध्यमा को सिकोड़ने व फैलाने से अंकुश मुद्रा होती है।
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