अगर किसी सभ्यता के विश्वास को गहराई समझना है, तो सबसे आसान तरीका उनकी अंतिम संस्कार विधियों को देखना है। कोई भी सभ्यता मृत देह को कूड़े में नहीं फेंकती है, हर सभ्यता हर धर्म मे अंतिम संस्कार की विधियां होती है। हर अंतिम संस्कार विधा के पीछे एक कहानी होती है। वह कहानी जो, किसी
मृत देह को नए कपड़े पहनाए जाते है, साज सज्जा, जरूरत का सामान शव के साथ रखा जाता है। प्राचीन काल मे सेवक सेविकाएं और ढेर सारा सोना चांदी भी शव के साथ ही दफनाए जाते थे। इसके पीछे अवधारणा ये होती है कि कयामत के रोज ईश्वर के सामने मृत व्यक्ति खूबसूरत दिखें। सनातन में पुनर्जन्म की
जब भाषा नहीं थी, कहानियां नहीं थी, तब संकेत या भाव थे। ईश्वर भी हमसे भावों या संकेतों में बात करते हैं। गुरुओं ने उन संकेतों को समझा और उन्हें कहानी के रूप में सँजोया। मौखिक परम्परा में उन कहानियों को एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक पहुंचाया गया। लिखित परम्परा आई तो नालंदा जैसी अनगिनत
आज हमारे पास विभिन्न संस्कारों से जुड़ी कहानियाँ है, उन्हें हज़ारों साल से यही ब्राह्मण पीढ़ी दर पीढ़ी लेकर आए है। एक ब्राह्मण को अपने आप मे ज्ञान की एक पूरी यूनिवर्सिटी माना जाता है, इसलिए ब्रह्म हत्या को सबसे बड़ा पाप माना गया है। नालंदा जैसी यूनिवर्सिटीज में ऐसी हज़ारों हज़ार
अब वो ज्ञान हासिल करना तो मुमकिन नहीं, लेकिन हमने अपना खोया गौरव जरूर हासिल कर लिया है। हमारे गुरुओं और ब्राह्मणों ने ज्ञान को बचाने के संघर्ष में यहां अपनी जानें कुर्बान की है। उनका कर्ज हमारी कई पीढ़ियों ने ढोया है। उनकी आत्मा जहां भी होगी, नालन्दा को फिर से खड़ा होते देख आज

