आजकल दिल्ली में भाजपा सरकार के दो अतिप्रशंसनीय कार्यक्रम चल रहे हैं - 1)यमुनाजी का पुनुरुद्धार 2)अवैध बस्तियों का सफाया पहले पर कुछ ही 'नागरिकों' को आपत्ति है कि अब उन्हें रोज नगरनिगम की गाड़ी में कचरा डालने की 'मेहनत' करनी पड़ रही है जबकि पहले आराम से ऑफिस जाते समय नदी नाले
दूसरे कार्य पर अवैध कब्जाधारियों की आपत्ति तो है ही, साथ ही कई इंसानियतपसंद समाजवादी हिंदुओं को भी आपत्ति है। इन लोगों का एकमात्र तर्क है -- "गरीब अब कहाँ जाये, मर जाये क्या?", पहली बात तो यह है कि अवैध कब्ज़ाधारियों में रोहिंग्या व बांग्लादेशी ही अधिकतम संख्या हैं तो
अगर नहीं, तो घर जा और दारु का एक पैग लगाकर, डिनर करके चुपचाप सो जा, तेरी औकात इससे ज्यादा इंसानियत का बोझ नहीं उठा पाएगी। इसके बाद इन 'बेचारे गरीबों' की खबर ली जाये कि जिनके यहाँ कटिया लगाकर कूलर और एसी चल रहे हैं। प्रथम तो ऐसी अधिकांश बस्तियाँ रोहिंग्या व बांग्लादेशियों
-सरकारी जमीन पर झुग्गी बसाओ, -गरीबी का वास्ता देकर उसे कानूनी बनाओ, -जमीनों को किसी बिल्डर को बेच दो, -फिर किसी नई जमीन पर एक बस्ती खड़ी करो, द्वितीय, देश के टैक्स पेयर्स का बहुत बड़ा हिस्सा इन गरीबों के मुफ्त भोजन, मुफ्त दवाइयों, मुफ्त बिजली में खर्च होता है। तृतीय, चोरी और
इतने कुटिल होने के बाद भी इनका नारा है कि गरीब बेचारा कहाँ जाये? किसी ने न्योता था क्या? चाहो तो अपने घर गाँव जाकर स्वरोजगार करो और वह भी न हो सके तो मर ही जाओ। तुम्हारे बिना भी संसार में बहुत गंदगी है। Follow me👉 @Brand_Netan हमसे व्हाट्सएप पर जुड़िए... लिंक

