फिल्मे समाज का दर्पण भी होती है और नैरेटिव बनाने के लिये एक हथियार भी होती है। 1950 से 1970 के दौर की फिल्मे देखे तो पता चलता है कि उन दिनों भारत मे गरीबी अपने उच्चतम पर थी। अंग्रेजो के जमाने के जमींदार जनता को परेशान कर रहे थे, महिलाओ की स्थिति नाजुक थी। 1970 से 1990 के दौर मे
क्योंकि हर दूसरी फ़िल्म मे दहेज़ या बहू प्रताड़ना होती थी, हत्याएं भी बहुत होती थी जो दर्शाता है कि आजादी के शुरूआती 40 वर्ष बुनियादी समस्याएं बनी हुई थी वैसे ये गाँधी परिवार का युग था। उसी दौर मे अमीर को विलेन और गरीब को हीरो के रूप मे प्रसिद्ध किया गया। सोवियत संघ के सामने
अंडरवर्ल्ड दिखाई देने लगा जिसे नेताओं का समर्थन था। पुलिस ज्यादातर भ्रष्ट थी, जो ईमानदार थे उनके घर वाले सुरक्षित नहीं थे। 2005 से 2017 तक हम देखते है ट्रेंड कम और नैरेटिव बिल्डिंग ज्यादा होती है, लगभग हर फ़िल्म मे एक अच्छा मुसलमान और विलेन पंडित, ठाकुर या बनिया जरूर दिखेगा।
2017 के बाद हम एक ट्रेंड मे शिफ्ट देखते है, ये वेबसीरीज का भी दौर है। भारत के एजेंट्स कैसे दुश्मनो को मारते है, सेना कैसे काम करती है, उर्दू को फिर से हिन्दी स्थान्तरित करती है, अब देवी देवताओं का मजाक नहीं उड़ता। ज्यादातर अभिनेता और अभिनेत्री धार्मिक होते है, नास्तिक भी होते है
पहले बताया जाता था कि हिन्दू धर्म कितना पाखंडी है आज बताया जाता है कि कितना वैज्ञानिक है, पंकज त्रिपाठी और यामी गौतम एक दूसरे के विरुद्ध है मगर हिंदुत्व के लिये अपने अपने ढंग से लड़ रहे है। ये है वो अंतर जो दर्शाता है कि लोगो की समझ मे क्या अंतर आया है, किसी भी OTT पर ज़ब नयी

