Published: December 20, 2025
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देवराहा बाबा जी ने स्वर एवं नाड़ी का रहस्य बताया एवं कहा निरोग तथा दीर्घ आयु का विशेष रहस्य ज्ञान है 🧵 नास्तिक,कामी, अधर्मी के लिए ये #thread नहीं है 🔷 कार्य सिद्धि करने के लिए नाड़ी का होता है विशेष प्रयोग 🔷 श्वास की लंबाई का रहस्य कौनसा है ?

2 ) हमारे वेदों के समय से साँसों के विज्ञान, उसके प्रयोग की कला के शास्त्र और जानकार रहे हैं। लेकिन हजारों सालों के अंतराल, तत्कालीन संस्कृत भाषा की जटिलता और किसी दूसरे को न बताने के स्वार्थ के चलते यह विज्ञान लुप्त-सा हो गया है। इसलिए साँस के विज्ञान से 99.99 प्रतिशत लोग अनजान

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3 ) देवराहा बाबा ने कैसे ये ज्ञान भरी बात एक पत्रकार को बताई, हैं। भारत में भी ऐसे कई संत हुए हैं, जो 250 साल तक स्वस्थ रहकर जीवित रहे। देवराहा बाबा इसका उदाहरण हैं। भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उनके बारे में कहा था कि उन्होंने बचपन में देवराहा बाबा को जैसा

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4 ) यानी साँस में हवा के अलावा भी कुछ होता है। भारतीय शास्त्रों में इसी को प्राण कहा गया है। यह हवा के माध्यम से प्रवाहित होनेवाली दिव्य ऊर्जा है। प्राण को सिर्फ हवा मान लेने से उसकी व्यापकता का अनुभव नहीं कर सकते। जबकि इसे अनुभव किया जा सकता है। जब भी आप किसी बीमार इनसान के पास

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5 ) मनुष्य के शरीर में अनेक नाड़ियों का जाल बिछा हुआ है। अपने शरीर को अच्छी तरह जानने के लिए बुद्धिमान लोगों को इनके विषय में अवश्य जानना चाहिए ये नाड़ियाँ हमारे शरीर के नाभिकेंद्र में अंकुर की तरह निकलकर पूरे शरीर में व्यवस्थित ढंग से फैली हुई हैं। इन नाड़ियों में सर्पाकार

6 ) सबसे पहले यह जान लें कि इड़ा नाड़ी को चंद्र नाड़ी, चंद्र स्वर या बाईं नाड़ी भी कहा जाता है। इड़ा स्त्री प्रधान है, जबकि पिंगला नाड़ी को सूर्य नाड़ी, सूर्य स्वर या दाईं नाड़ी भी कहते हैं। यह पुरुष प्रधान है, इसलिए आगे की जानकारी में इन नाड़ियों के अलग-अलग नामों से भ्रमित न

7 ) देवराहा बाबा का जिक्र किया गया है, वे स्वर साधना ही करते थे। और वे दिन में जिस चंद्र और रात में जिस सूर्य को चलाने की बात कर रहे थे, वह दरअसल इड़ा और पिंगला नाड़ी की बात थी। इड़ा नाड़ी को चंद्र और पिंगला को सूर्य कहते हैं, क्योंकि इड़ा नाड़ी का सीधा संबंध चंद्रमा से और पिंगला

8 ) कैसे पहचानें नाड़ी ? हम बड़ी आसानी से नाड़ियों की पहचान कर सकते हैं कि कब, कौन सी नाड़ी सक्रिय है। इसके लिए आँख बंद करके हाथों द्वारा नाक के छिद्रों से बाहर निकलती हुई साँस को महसूस करने का प्रयास कीजिए। देखिए कि नासिका के कौन से छिद्र से साँस बाहर निकल रही है। अगर दाहिने

9 ) ऐसे ठीक करें नाड़ी हमारी नाड़ियों का प्राकृतिक क्रम कैसा होना चाहिए? यदि किसी व्यक्ति का क्रम बिगड़ा हुआ है तो उसे सही कैसे करें ? इसे ठीक से जानने के लिए सबसे पहले हिंदी के कैलेंडर को समझना जरूरी है। हर महीने में पंद्रह- पंद्रह दिन के दो पक्ष होते हैं। पंद्रह दिन चंद्रमा

10 ) कैसे बदलें नाड़ी ? नाड़ी बदलना अति आसान है। देख लें कि उस दिन सूर्योदय का सही वक्त क्या है, फिर सूर्योदय से 10 मिनट पहले जाग जाएँ और बिस्तर पर ही लेटे हुए चेक करें कि कौन सी नाड़ी चल रही है। यदि ऊपर बताए क्रम के अनुसार ठीक नाड़ी चल रही है तो जो नाड़ी चल रही है, उसके विपरीत

11 ) कैसे करें कार्य सफल ? हमारा शरीर जिस ऊर्जा से संचालित होता है, वह विद्युत् के समान है। जैसे बिजली में शॉर्ट सर्किट होने पर होता है, वैसे ही हमारे शरीर की ऊर्जा के साथ भी होता है। अगर आप नंगे पाँव बिजली के पॉजिटिव तार को छू लेंगे तो करंट का झटका लगेगा; क्योंकि पृथ्वी अर्थ का

12 ) इड़ा नाड़ी के प्रवाह काल में किए जानेवाले कार्य स्थायी परिणाम देनेवाले जितने भी कार्य हैं, उन्हें इड़ा नाड़ी यानी चंद्र स्वर चलने के दौरान शुरू करना चाहिए। लेकिन अच्छे परिणाम तभी मिलेंगे, जब इड़ा नाड़ी में जल या पृथ्वी तत्त्व चल रहा हो। अग्नि, वायु या आकाश तत्त्व चलने पर यह

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13 ) पिंगला नाड़ी के प्रवाह काल में किए जानेवाले कार्य व्यायाम, स्वीमिंग, भोजन, स्नान, हॉर्स राइडिंग, सेक्स, शत्रु पर विजय, यंत्र-तंत्र की उपासना, पहाड़ चढ़ना, उच्चाटन, मोहन (वशीकरण), स्तंभन, तंत्र साधना, प्रेरित करना, दान लेना-देना तथा इंद्रिय सुख का भोग आदि कार्य सूर्य स्वर

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14 ) स्वर-शास्त्र के अनुसार, हमको रुपयों-पैसों का लेन-देन उसी हाथ से करना चाहिए, जिस तरफ की उस वक्त नाड़ी सक्रिय हो। इसके अलावा, अपने मित्रों को भी उसी ओर रखकर बात करें, जिस तरफ का स्वर सक्रिय हो। दफ्तर में बॉस के साथ भी यही बात लागू होती है। दरअसल, जिस तरफ की नाड़ी सक्रिय होती

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15 ) सुषुम्ना नाड़ी के प्रवाह काल में किए जानेवाले कार्य जब दोनों नासिका से साँस बाहर निकले या पल में साँस बाएँ से दाएँ और पल में दाहिने से बाएँ बदलने लगे तो समझना चाहिए कि सुषुम्ना नाड़ी चल रही है। चूँकि सुषुम्ना नाड़ी चलती ही तब है, जब इड़ा को पिंगला या पिंगला को इड़ा में

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